विहसते चंदा की चञ्चल बाहुओं में,
चाँदनी मदहोश अलसायी हुई सी।
विधु ने सींचा विभा अधरों से अमृत,
चंद्र-बाहुपाश सकुचायी हुई सी
साँझ ने जब चाँद के संग रात देखी,
डाह में डूबी सी, मुरझायी हुई सी।
हृदय के अवसाद अश्रु बन कर ढले हैं।
है उनींदी साँझ भर आयी हुई सी